Holika Dahan 2026: भद्रा काल में क्यों वर्जित है होलिका दहन? अनिष्ट प्रभाव से बचने के लिए जानें खास उपाय

Holika Dahan 2026

होलिका दहन हिन्दू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक उत्सव है, जो होली से एक रात पहले फाल्गुन पूर्णिमा की रात को मनाया जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है और प्रह्लाद की भक्ति तथा होलिका के दहन की कथा से जुड़ा हुआ है।

लेकिन ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भद्रा काल (Bhadra Kaal) में यह अनुष्ठान नहीं किया जाता। भद्रा काल उस समय के लिए कहा जाता है जब चंद्रमा की स्थिति अशुभ प्रभाव देने वाली मानी जाती है और इस दौरान कोई शुभ कार्य या धार्मिक कर्म नहीं करना चाहिए।

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भद्रा काल क्या होता है?

भद्रा काल वह अवधि है जिसमें मनाया जाता है कि नकारात्मक ऊर्जा और अनिष्ट प्रभाव सक्रिय रहते हैं। हिंदू पंचांग में कहा गया है कि इस समय पर मांगलिक कार्यों जैसे गृह प्रवेश, विवाह, मुंडन संस्कार आदि भी वर्जित होते हैं। यही कारण है कि भद्रा के दौरान होलिका दहन को अशुभ माना जाता है।

होलिका दहन किस समय किया जाना चाहिए?

ज्योतिष के अनुसार, अगर भद्रा काल होलिका दहन के निर्धारित प्रदोष काल के दौरान मौजूद रहे, तो पूजा और दहन केवल भद्रा समाप्त होने के बाद ही किये जाने चाहिए। 2025 में ऐसा ही समय रहा जब भद्रा लगभग दिनभर रहा और होलिका दहन का शुभ मुहूर्त रात के 11:26 बजे से शुरुआती मध्यरात्रि तक माना गया था। इससे पहले पूजा और दहन अनिष्ट का अवसर बढ़ा सकते हैं।

भद्रा काल के अशुभ प्रभावों से बचने के उपाय

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा काल के प्रभावों से बचने के लिए निम्न उपाय उपयोगी माने जाते हैं:

  • भद्रा समाप्त होने तक पूजा की तैयारी करें, परंतु दहन न करें।
  • भगवान विष्णु और शिव का स्मरण या जाप करें, जिससे सकारात्मक ऊर्जा बनी रहे।
  • गायत्री मंत्र या अन्य शुभ मंत्रों का जाप करें, ताकि मन में सकारात्मकता और शांति बनी रहे।

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होलिका दहन का धार्मिक महत्व

होलिका दहन केवल रिवाज नहीं है, बल्कि यह बुराई पर सत्य, भक्ति और कर्म की विजय का संदेश देता है। इसलिए इसे शुभ मुहूर्त में और भद्रा से मुक्त समय में करना आवश्यक माना जाता है, ताकि परिवार के स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि बनी रहे।

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