
महाभारत केवल एक युद्ध कथा नहीं है, बल्कि यह धर्म, नीति, रणनीति और ईश्वरीय हस्तक्षेप का अद्भुत संगम है। इस महाकाव्य में कई ऐसे प्रसंग मिलते हैं, जहाँ प्रकृति स्वयं युद्ध की दिशा बदलती दिखाई देती है। ऐसा ही एक अत्यंत रोचक और रहस्यमय प्रसंग सूर्य ग्रहण से जुड़ा हुआ है, जिसने महान धनुर्धर अर्जुन के जीवन की रक्षा की।
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अभिमन्यु वध के बाद अर्जुन की भयानक प्रतिज्ञा
कुरुक्षेत्र युद्ध के 13वें दिन चक्रव्यूह में फँसाकर अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की निर्मम हत्या कर दी गई। इस षड्यंत्र में सिंधु नरेश जयद्रथ की अहम भूमिका थी, जिसने अन्य पांडवों को युद्ध क्षेत्र में प्रवेश करने से रोक दिया था।
पुत्र शोक में व्यथित अर्जुन ने प्रतिज्ञा ली कि अगले दिन सूर्यास्त से पहले यदि जयद्रथ का वध नहीं हुआ, तो वह स्वयं अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्याग देंगे। यह प्रतिज्ञा केवल अर्जुन के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे पांडव पक्ष के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन गई।
कौरवों की रणनीति और अर्जुन पर बढ़ता संकट
अर्जुन की प्रतिज्ञा से भयभीत कौरवों ने जयद्रथ की रक्षा के लिए अभेद्य व्यूह रचना की। द्रोणाचार्य, कर्ण, कृपाचार्य जैसे महारथी जयद्रथ के चारों ओर तैनात कर दिए गए। युद्ध दिन भर चला, लेकिन सूर्य धीरे-धीरे अस्त होने की ओर बढ़ रहा था।
जैसे-जैसे सूर्यास्त का समय निकट आया, वैसे-वैसे अर्जुन की चिंता बढ़ती गई। यदि सूर्य अस्त हो जाता, तो उन्हें अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार प्राण त्यागने पड़ते।
श्रीकृष्ण की माया और सूर्य ग्रहण का भ्रम
ऐसे संकटपूर्ण समय में श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य लीला दिखाई। उन्होंने अपनी योगमाया से सूर्य ग्रहण जैसा दृश्य उत्पन्न कर दिया। अचानक आकाश में अंधकार छा गया और ऐसा प्रतीत होने लगा मानो सूर्य अस्त हो चुका हो।
इस अप्रत्याशित घटना को देखकर कौरव सेना आनंदित हो उठी। जयद्रथ को लगा कि अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा हार चुके हैं और अब वह सुरक्षित है। इसी भ्रम में वह रक्षात्मक घेरे से बाहर आ गया।
जयद्रथ वध और सूर्य का पुनः उदय
जैसे ही जयद्रथ बाहर आया, श्रीकृष्ण ने अपनी माया हटा ली और सूर्य पुनः आकाश में दिखाई देने लगा। यह क्षण अत्यंत निर्णायक था। अर्जुन ने उसी पल अपने गांडीव से प्रचंड बाण चलाकर जयद्रथ का वध कर दिया और अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की।
यह प्रसंग दर्शाता है कि महाभारत में युद्ध केवल अस्त्र-शस्त्रों से नहीं, बल्कि बुद्धि, समय और ईश्वरीय योजना से भी जीता गया।
सूर्य ग्रहण का पौराणिक महत्व
महाभारत में सूर्य ग्रहण को केवल खगोलीय घटना नहीं माना गया है। पौराणिक दृष्टि से ग्रहण वह समय होता है जब सामान्य नियमों से परे घटनाएँ घटती हैं। यही कारण है कि ग्रहण काल को रहस्यमय और शक्तिशाली माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार:
- ग्रहण के समय किया गया जप-तप कई गुना फलदायी होता है
- दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है
- आत्मचिंतन और साधना के लिए यह समय श्रेष्ठ माना गया है
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महाभारत और खगोलीय घटनाएँ
महाभारत में कई स्थानों पर ग्रहण, उल्कापात और आकाशीय संकेतों का उल्लेख मिलता है। ये घटनाएँ आने वाले विनाश या बड़े परिवर्तन का संकेत मानी जाती थीं। जयद्रथ वध से जुड़ा सूर्य ग्रहण भी इसी श्रेणी में आता है।
यह पूरा युद्ध कुरुक्षेत्र की भूमि पर हुआ, जिसे धर्मक्षेत्र कहा गया है, जहाँ स्वयं प्रकृति ने धर्म की विजय में भूमिका निभाई।
