
हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक के 8 दिन को होलाष्टक कहा जाता है। यह समय धार्मिक दृष्टि से अशुभ माना जाता है, इसलिए इस दौरान विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य वर्जित होते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन 8 दिनों में अष्ट लोकपाल और ग्रह उग्र अवस्था में रहते हैं, जिससे नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। यही कारण है कि शास्त्रों में होलाष्टक काल में संयम और साधना पर विशेष जोर दिया गया है।
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Holashtak 2026 कब से कब तक रहेगा?
- होलाष्टक प्रारंभ: फाल्गुन शुक्ल अष्टमी – 2026 में मार्च के पहले सप्ताह में
- होलाष्टक समाप्त: फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा (होलिका दहन की रात)
होलिका दहन के साथ ही होलाष्टक समाप्त हो जाता है, और इसके अगले दिन रंगों की होली मनाई जाती है।
होलाष्टक के दौरान क्या नहीं करना चाहिए? (Don’ts)
होलाष्टक के 8 दिनों में निम्न कार्यों से बचना चाहिए:
- विवाह या सगाई
- गृह प्रवेश
- नामकरण, मुंडन, कर्णछेदन
- नया व्यापार या बड़ा निवेश
- भूमि पूजन या वाहन खरीद
मान्यता है कि इन कार्यों से जीवन में बाधाएं और मानसिक अशांति आ सकती है।
होलाष्टक में क्या करना शुभ माना जाता है? (Do’s)
हालांकि यह काल अशुभ माना जाता है, लेकिन धार्मिक कार्यों के लिए यह समय अत्यंत फलदायी होता है।
- भगवान विष्णु और शिव की पूजा
- मंत्र जाप (महामृत्युंजय मंत्र, विष्णु सहस्रनाम)
- व्रत, उपवास और साधना
- दान-पुण्य (अन्न, वस्त्र, धन)
- हवन और जप-तप
माना जाता है कि होलाष्टक में किया गया दान कई गुना फल देता है।
होलाष्टक का धार्मिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, होलाष्टक के समय भक्त प्रह्लाद को अत्याचार सहना पड़ा था। इसी कारण यह काल कष्ट, तप और परीक्षा का प्रतीक माना जाता है।
होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, जिसके बाद शुभ कार्यों की पुनः शुरुआत होती है।
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निष्कर्ष
Holashtak 2026 संयम, साधना और आत्मशुद्धि का समय है। इस दौरान भौतिक सुखों से दूरी बनाकर ईश्वर भक्ति और दान-पुण्य पर ध्यान देना चाहिए। होलिका दहन के साथ यह अशुभ काल समाप्त हो जाता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है।
