
जय-विजय की कथा: हिरण्याक्ष से शिशुपाल तक पौराणिक रहस्य
सनातन धर्म की पौराणिक कथाएँ भगवान विष्णु और उनके परम भक्तों से जुड़ी अनेक अलौकिक गाथाएँ कहती हैं। इनमें से एक प्राचीन और रोचक कहानी है विष्णुजी के द्वारपाल जय और विजय की, जिन पर एक श्राप से तीन जन्मों तक राक्षस रूप में जन्म लेने का नियम लगा। यह कथा न केवल रहस्य से भरी है, बल्कि भगवान की लीला और कर्म-फल के नियम को भी दर्शाती है।
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श्राप क्यों मिला?
वैकुंठ के द्वारपाल जय और विजय भगवान विष्णु के अत्यंत प्रिय सेवक थे। एक बार चारों कुमारों — सनक, सनंदन, सनातन और सनतकुमार — ने भगवान के दर्शन के लिए वैकुंठ में प्रवेश चाहा, लेकिन द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया। इससे क्रोधित होकर ऋषियों ने उन्हें श्राप दिया कि वे तीन जन्मों तक पृथ्वी पर असुर रूप में जन्म लेंगे। बाद में भगवान विष्णु ने श्राप की शर्तें तय कीं कि वे तीन जन्मों तक उनके “शत्रु” बनकर जन्म लेकर अंत में उन्हीं के हाथों मारे जाएंगे और फिर वैकुंठ लौट पाएंगे।
पहला जन्म — हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु
सबसे पहले सत्ययुग में दोनों भाइयों ने हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जन्म लिया। हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को पाताल लोक में ले जाकर संकट खड़ा किया, तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार ग्रहण कर उनका संहार किया। वहीं हिरण्यकशिपु ने कठोर तप किया और अजेय होने का वरदान पा लिया, पर उसकी हिंसक हरकतों के कारण भगवान ने नरसिंह अवतार लेकर उसका वध किया।
दूसरा जन्म — रावण और कुंभकर्ण
त्रेता युग में दोनों फिर जन्म लेकर रावण और कुंभकर्ण बने। रावण अहंकार और तपस्वी विद्वत्ता के कारण शक्तिशाली था, लेकिन अंत में उसने माता सीता का अपहरण कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि भगवान विष्णु ने राम अवतार लेकर उसकी नीति और अहंकार को समाप्त किया। रावण और उसके भाई कुंभकर्ण दोनों ही राम के हाथों मारे गए।
तीसरा जन्म — शिशुपाल और दंतवक्र
तीसरे जन्म में दोनों ने शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में जन्म लिया। शिशुपाल बचपन से ही श्रीकृष्ण के विरोध में था। राजसूय यज्ञ के समय उसने भगवान कृष्ण का अपमान किया, जिसके बाद भगवान ने सुदर्शन चक्र से उसका वध किया। इसी प्रकार दंतवक्र का भी कृष्ण द्वारा वध हुआ और इसी मृत्यु के बाद उन पर लगा श्राप समाप्त हुआ।
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इन तीन जन्मों का उद्देश्य
इन तीन जन्मों का मूल उद्देश्य यही था कि जय-विजय भगवान विष्णु के हाथों मृत्यु पाएं, जिससे उनकी श्राप यात्रा पूरी हो और वे फिर वैकुंठ लौट सकें। विष्णु से उनका संबंध कभी टूटा नहीं; प्रतिजन भगवान की लीला और आदेश का ही यह परिणाम था।


