
भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग अपनी अनोखी परंपराओं के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। खासकर यहां होने वाली भस्म आरती का महत्व बहुत ज्यादा माना जाता है।
महाशिवरात्रि हो या सामान्य दिन — रोज सुबह ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली यह आरती देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं।
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क्या है भस्म आरती?
भस्म आरती में भगवान महाकाल का विशेष श्रृंगार किया जाता है। सबसे पहले शिवलिंग का जल और पंचामृत से अभिषेक होता है। इसके बाद चिता की भस्म से भगवान का अलंकरण किया जाता है।
यही कारण है कि इसे “भस्म आरती” कहा जाता है।
यह आरती हमें जीवन की सच्चाई बताती है — कि एक दिन सब कुछ भस्म में ही मिल जाता है।
महिलाएं क्यों रखती हैं घूंघट?
भस्म चढ़ाने के समय एक खास परंपरा निभाई जाती है। उस दौरान मंदिर में मौजूद महिलाओं को घूंघट या पल्लू से चेहरा ढकना होता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है, तब वे श्मशान वासी स्वरूप में होते हैं। इस क्षण को अत्यंत गूढ़ और पवित्र माना जाता है। इसलिए महिलाओं को उस विशेष समय प्रत्यक्ष दर्शन की अनुमति नहीं होती।
हालांकि, जैसे ही भस्म अर्पण की प्रक्रिया पूरी होती है, उसके बाद सभी भक्त सामान्य रूप से दर्शन कर सकते हैं।
क्या आज भी लागू है यह नियम?
हाँ, मंदिर प्रशासन द्वारा यह परंपरा आज भी निभाई जाती है। भस्म आरती में शामिल होने के लिए पहले से रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होता है, क्योंकि सीमित संख्या में ही श्रद्धालुओं को प्रवेश दिया जाता है।
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भस्म आरती का आध्यात्मिक संदेश
- जीवन अस्थायी है
- अहंकार का अंत निश्चित है
- मृत्यु ही अंतिम सत्य है
- शिव ही सृष्टि और संहार के स्वामी हैं
भस्म आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन दर्शन भी है।


