
प्राचीन समय की बात है। भोगीपुर नामक नगर में पुण्डरीक नाम के राजा का राज्य था। उस राज्य में गंधर्व (स्वर्गीय गायक) और अप्सराएं निवास करते थे।
उसी नगर में एक गंधर्व था जिसका नाम ललित था और उसकी पत्नी का नाम ललिता था। दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे।
एक दिन राजा पुण्डरीक के दरबार में नृत्य-गान का आयोजन हुआ। उस सभा में ललित भी गा रहा था, लेकिन उसका मन अपनी पत्नी ललिता में ही लगा हुआ था। इसी कारण वह सुर और ताल में गलती कर बैठा।
दरबार में मौजूद एक नाग (सर्प) ने राजा से शिकायत कर दी कि ललित ने राजसभा का अपमान किया है। यह सुनकर राजा पुण्डरीक क्रोधित हो गए और उन्होंने ललित को राक्षस (भयंकर दानव) बनने का श्राप दे दिया।
अपने पति को राक्षस बने देखकर ललिता अत्यंत दुखी हो गई। वह अपने पति के साथ जंगल-जंगल भटकने लगी। एक दिन उसे ऋषि शृंगी का आश्रम मिला।
ललिता ने ऋषि से अपने दुख की कथा सुनाई और समाधान पूछा। तब ऋषि शृंगी ने कहा—
“यदि तुम कामदा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करोगी, तो तुम्हारे पति का श्राप समाप्त हो जाएगा।”
ललिता ने पूरे श्रद्धा और नियम के साथ कामदा एकादशी का व्रत किया और उसका पुण्य अपने पति को अर्पित कर दिया।
व्रत के प्रभाव से ललित का राक्षस रूप समाप्त हो गया और वह पुनः सुंदर गंधर्व बन गया। दोनों पति-पत्नी फिर से सुखपूर्वक रहने लगे।
कामदा एकादशी का महत्व
- यह व्रत सभी पापों का नाश करता है
- जीवन की मनोकामनाएं पूर्ण करता है
- दांपत्य जीवन में सुख और प्रेम बढ़ाता है
- श्राप और नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति दिलाता है
व्रत विधि (संक्षेप में)
- प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें
- व्रत का संकल्प लें
- फलाहार या निर्जला व्रत रखें
- विष्णु सहस्त्रनाम या कथा का पाठ करें
- अगले दिन द्वादशी पर व्रत का पारण करें
निष्कर्ष
कामदा एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और समर्पण की शक्ति का प्रतीक है। ललिता की अटूट श्रद्धा ने यह साबित कर दिया कि सच्ची भक्ति से बड़े से बड़ा संकट भी दूर किया जा सकता है।
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