
2026 का पहला चंद्र ग्रहण फाल्गुन पूर्णिमा (3 मार्च 2026) को लग रहा है, जिसे हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में केवल एक खगोलीय घटना नहीं बल्कि आध्यात्मिक रूप से संवेदनशील समय माना जाता है। इस दौरान सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या ग्रहण के समय यात्रा करनी चाहिए या इससे बचना चाहिए? आइए शास्त्रों के अनुसार नियम और जरूरी सावधानियों को समझते हैं।
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ग्रहण काल क्यों संवेदनशील माना जाता है?
हिंदू परंपरा में ग्रहण को सिर्फ खगोलीय घटना के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसे ऊर्जा-भरे समय के रूप में माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब राहु-केतु सूर्य या चंद्रमा को ग्रसित करते हैं, तब वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ता है। इसी वजह से ग्रहण दौरान अनावश्यक कामों से बचने की सलाह दी जाती है।
सूतक काल क्या होता है?
- ग्रहण से लगभग 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू माना जाता है।
- इस दौरान मंदिरों के पट बंद कर दिए जाते हैं।
- यात्रा, शुभ कार्य, विवाह, खरीदारी या नए काम की शुरुआत वर्जित मानी जाती है।
- सूतक काल को शास्त्रों में संयम, ध्यान और साधना का समय बताया गया है।
क्या ग्रहण के दौरान यात्रा करनी चाहिए?
शास्त्रों और ज्योतिषिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण काल में यात्रा से बचने की सलाह दी जाती है, खासकर:
- लंबी दूरी की यात्रा
- नया व्यवसायिक सफर
- महत्वपूर्ण मीटिंग के लिए निकलना
इन सबको ग्रहण के बाद करने की सलाह दी जाती है क्योंकि मान्यता है कि इस समय नकारात्मक ऊर्जा और बाधाएँ अधिक हो सकती हैं।
अगर यात्रा जरूरी हो तो क्या करें?
अगर किसी कारण से यात्रा करना आवश्यक है, तो शास्त्र कुछ उपाय सुझाते हैं:
- घर से निकलने से पहले भगवान का स्मरण या मंत्र जप करें।
- यात्रा के बाद स्नान करें, साफ वस्त्र पहनें और पूजा-पाठ करें।
- ऐसा करने से नकारात्मक प्रभाव कम माना जाता है।
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ग्रहण काल में क्या करें?
- भगवान के नाम का जप और ध्यान करें।
- जरूरतमंदों को दान दें।
- ग्रहण के बाद घर की सफाई और स्नान करें।
- पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखें।


