
सनातन धर्म के ग्रंथों में विष्णु पुराण का विशेष स्थान है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण के अवतार, उनकी लीलाओं और अंत में देह त्याग की अत्यंत गूढ़ कथा का वर्णन मिलता है। यह कथा केवल एक मृत्यु की कहानी नहीं, बल्कि कर्म, काल और धर्म के शाश्वत सिद्धांतों को समझाने वाली आध्यात्मिक गाथा है।
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द्वारका का अंत और यदुवंश का अहंकार
महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण ने द्वारका में यदुवंश का संचालन किया। समय के साथ यदुवंशी युवाओं में अहंकार बढ़ने लगा। वे ऋषि-मुनियों का उपहास करने लगे और अपने बल व वैभव पर गर्व करने लगे। यही अहंकार आगे चलकर पूरे वंश के विनाश का कारण बना।
एक मजाक जिसने बदल दी इतिहास की दिशा
विष्णु पुराण के अनुसार, एक बार यदुवंशी युवकों ने ऋषि-मुनियों के साथ मजाक किया। उन्होंने श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को स्त्री का वेश पहनाकर यह पूछा कि “यह स्त्री क्या पुत्र को जन्म देगी?”
ऋषियों ने अपने तपोबल से जान लिया कि यह अपमान है। क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया कि इस मजाक के परिणामस्वरूप लोहे का मूसल उत्पन्न होगा, जो पूरे यदुवंश का नाश कर देगा।
श्राप से मूसल और उसका प्रभाव
श्राप के अनुसार साम्ब के गर्भ से एक लोहे का मूसल उत्पन्न हुआ। यदुवंशियों ने उसे नष्ट करने का प्रयास किया, लेकिन उसके चूर्ण के कण समुद्र तट पर फैल गए। वही कण आगे चलकर घास के समान कठोर बन गए। समय आने पर इन्हीं से यदुवंशियों के बीच आपसी संघर्ष हुआ और पूरा वंश समाप्त हो गया।
श्रीकृष्ण का मौन और काल का विधान
श्रीकृष्ण इस पूरे घटनाक्रम को जानते थे, फिर भी उन्होंने इसे रोका नहीं। विष्णु पुराण बताता है कि यह काल का विधान था। जब धरती से अधर्म का नाश हो चुका था और अवतार का उद्देश्य पूर्ण हो गया, तब स्वयं श्रीकृष्ण ने लीला को समेटने का निर्णय लिया।
जरा शिकारी और देह त्याग की लीला
यदुवंश के विनाश के बाद श्रीकृष्ण प्रभास क्षेत्र में ध्यान मुद्रा में विश्राम कर रहे थे। उनके चरणों को हिरण समझकर जरा नामक शिकारी ने बाण चला दिया। यह बाण उनके पैर में लगा।
पुराणों में स्पष्ट किया गया है कि यह कोई सामान्य दुर्घटना नहीं थी, बल्कि पूर्व जन्म के कर्मों से जुड़ी घटना थी। श्रीकृष्ण ने जरा को क्षमा किया और उसे मोक्ष का वरदान दिया। इसके बाद उन्होंने अपने मानव शरीर का त्याग किया।
क्या श्रीकृष्ण की मृत्यु हुई?
शास्त्रों के अनुसार श्रीकृष्ण की “मृत्यु” नहीं हुई। उन्होंने केवल देह का परित्याग किया। उनका दिव्य, अविनाशी स्वरूप वैकुंठ धाम को प्रस्थान कर गया। इसलिए सनातन परंपरा में इसे मृत्यु नहीं, बल्कि अवतार लीला की पूर्णता कहा जाता है।
आध्यात्मिक और नैतिक संदेश
इस पूरी कथा से कई गहरे संदेश मिलते हैं:
- अहंकार और मजाक भी विनाश का कारण बन सकते हैं
- ऋषियों और धर्म का अपमान अंततः पतन लाता है
- ईश्वर भी काल और कर्म के नियमों को लीला रूप में स्वीकार करते हैं
- देह नश्वर है, आत्मा और परम तत्व शाश्वत है
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निष्कर्ष
विष्णु पुराण में वर्णित श्रीकृष्ण का देह त्याग हमें यह सिखाता है कि जब सृष्टि में संतुलन स्थापित हो जाता है, तब ईश्वर अपने अवतार को पूर्ण कर लेते हैं। यह कथा केवल शोक नहीं, बल्कि धर्म, वैराग्य और मोक्ष का मार्ग दिखाने वाली अमर शिक्षा है।
