
भारत एक ऐसा देश है जहाँ हर तिथि, हर पर्व और हर व्रत का अपना अलग महत्व है। यहाँ धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन जीने की एक शैली है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि एक ही दिन दो महत्वपूर्ण पर्व पड़ जाते हैं और व्यक्ति के मन में यह प्रश्न उठने लगता है कि आखिर किस परंपरा का पालन किया जाए।
ऐसी ही एक स्थिति तब बनती है जब Shattila Ekadashi और Makar Sankranti एक ही दिन पड़ते हैं।
एक ओर शततिला एकादशी पर चावल न खाने की मान्यता है, तो दूसरी ओर मकर संक्रांति पर चावल से बने व्यंजन जैसे खिचड़ी, पुलाव, पोंगल आदि का विशेष महत्व होता है।
यह लेख इसी द्वंद्व को समझाने का एक ईमानदार प्रयास है।
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शततिला एकादशी (Shattila Ekadashi) का धार्मिक महत्व
Shattila Ekadashi माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और “तिल” का विशेष महत्व होता है।
शततिला एकादशी क्यों खास है?
- इस दिन तिल का दान, तिल से स्नान, तिल का सेवन और तिल का हवन अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है
- यह एकादशी पापों के नाश और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताती है
- कहा जाता है कि इस दिन श्रद्धा से किया गया व्रत कई जन्मों के कर्मों को शुद्ध करता है
शततिला एकादशी के सकारात्मक पक्ष (Positive Aspects)
- आत्मशुद्धि का दिन – व्रत मन और शरीर दोनों को संयम सिखाता है
- दान की भावना – तिल, वस्त्र और अन्न दान से समाज में सेवा भाव बढ़ता है
- सात्त्विक जीवनशैली – सरल भोजन और पूजा से मानसिक शांति मिलती है
- भक्ति का अवसर – भगवान विष्णु से जुड़ने का विशेष दिन
शततिला एकादशी के नकारात्मक/संयम पक्ष (Negative or Restrictions)
यहाँ “नकारात्मक” शब्द का अर्थ बुरा नहीं, बल्कि नियम और संयम से है।
- चावल और उससे बने पदार्थों का त्याग
- तामसिक भोजन से परहेज
- आलस्य, क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूर रहना
👉 कई लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि जब उसी दिन Makar Sankranti हो तो क्या करें?
मकर संक्रांति (Makar Sankranti) का महत्व
Makar Sankranti सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का पर्व है। यह केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और सांस्कृतिक पर्व भी है।
मकर संक्रांति का सकारात्मक महत्व (Positive Aspects)
- नई शुरुआत का प्रतीक – सूर्य का उत्तरायण होना
- स्वास्थ्य से जुड़ा पर्व – तिल और गुड़ शरीर को गर्मी देते हैं
- सामाजिक समरसता – दान, भोज और मेल-जोल
- कृषि पर्व – नई फसल का उत्सव
मकर संक्रांति और चावल का महत्व
भारत के कई हिस्सों में इस दिन चावल से जुड़े व्यंजन बनाए जाते हैं:
- उत्तर भारत में खिचड़ी
- दक्षिण भारत में पोंगल
- पूर्व भारत में पिठा और चावल के पकवान
इसलिए Makar Sankranti पर चावल का सेवन परंपरा का हिस्सा बन चुका है।
जब शततिला एकादशी और मकर संक्रांति एक ही दिन हों
यहीं से असली दुविधा शुरू होती है।
“आज Shattila Ekadashi है, मैं चावल नहीं खाता…
लेकिन आज Makar Sankranti भी है, घर में खिचड़ी बनी है…”
यह स्थिति केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय और पारिवारिक भी है।
क्या एकादशी में चावल न खाना ज़रूरी है?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, एकादशी पर चावल त्याग का कारण है:
- चावल में जल तत्व अधिक होता है
- एकादशी उपवास शरीर को हल्का रखने के लिए होता है
- आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाने के लिए सात्त्विक आहार जरूरी माना गया है
तो मकर संक्रांति का क्या करें?
यहाँ धर्म हमें कट्टरता नहीं, संतुलन सिखाता है।
समाधान – आस्था के साथ व्यवहारिक सोच
- यदि आपने Shattila Ekadashi का व्रत रखा है
- आप चावल न खाएँ
- तिल, फल, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े से बने व्यंजन लें
- परिवार में मकर संक्रांति के चावल के व्यंजन बने हों
- आप सम्मानपूर्वक उनका प्रसाद स्वीकार कर सकते हैं (बिना खाने के)
- अगले दिन या पारण के बाद सेवन कर सकते हैं
- यदि आप व्रत नहीं कर रहे
- तो मकर संक्रांति के नियमों का पालन करें
- तिल-गुड़ और चावल का सेवन कर सकते हैं
धर्म का असली संदेश: भाव महत्वपूर्ण है, भोजन नहीं
भगवान को सबसे अधिक प्रिय है आपका भाव।
अगर आपने श्रद्धा से Shattila Ekadashi का पालन किया,
और मकर संक्रांति पर किसी का दिल नहीं दुखाया,
तो वही सच्चा धर्म है।
सकारात्मक और नकारात्मक का संतुलन
| विषय | सकारात्मक | संयम/नकारात्मक |
|---|---|---|
| Shattila Ekadashi | आत्मशुद्धि, भक्ति, दान | चावल त्याग |
| Makar Sankranti | उत्सव, स्वास्थ्य, सामाजिकता | अधिक भोजन से परहेज |
मानवीय दृष्टिकोण (Human Touch)
धर्म हमें बाँटने नहीं, जोड़ने सिखाता है।
अगर आपकी माँ ने मकर संक्रांति पर प्रेम से खिचड़ी बनाई है,
और आपने एकादशी का व्रत रखा है —
तो सम्मान, संवाद और समझदारी सबसे बड़ा समाधान है।
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निष्कर्ष
Shattila Ekadashi और Makar Sankranti दोनों ही अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व हैं।
एक संयम सिखाता है, दूसरा उत्सव।
एक भीतर की शुद्धि करता है, दूसरा समाज से जोड़ता है।
जब दोनों एक ही दिन हों, तो
👉 कट्टरता नहीं, संतुलन अपनाएँ
👉 आस्था रखें, पर विवेक न छोड़ें
यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी सुंदरता है।
